Highcourt News : गाजियाबाद की रहने वाली 70 वर्षीय वृद्धा लोकेश देवी को आखिरकार राहत मिली है। उच्च न्यायालय ने उपजिलाधिकारी द्वारा 26 अप्रैल 2025 को पारित दुकान अनुबंध निलंबन के आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी है। इस निर्णय के साथ ही लोकेश देवी को न्याय की एक नई किरण नजर आई है और वह अब एक बार फिर से अपनी राशन की दुकान खोल सकेंगी।
क्या है पूरा मामला?
लोकेश देवी, जो वर्ष 2002 से अपने दिवंगत पति के बाद से फेयर प्राइस शॉप (राशन की दुकान) चला रही थीं, उन्हें दिनांक 16 अप्रैल 2025 को उपजिलाधिकारी मोदीनगर, गाजियाबाद द्वारा निरीक्षण के दौरान खाद्यान्न कम तौलने का दोषी माना। इसके बाद 26 अप्रैल 2025 को बिना विस्तृत जांच और जवाब का अवसर दिए उनकी दुकान का अनुबंध निलंबित कर दिया गया।
बिना सुनवाई, बिना निष्पक्ष जांच?
लोकेश देवी की ओर से उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अधिवक्ताओं शरदेंदु मिश्र और जयशंकर मिश्र ने दलील दी कि उक्त कार्रवाई में नियमानुसार वादिनी को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया। निरीक्षण की तारीख, नोटिस और निलंबन आदेश – सब कुछ एक ही दिन में किया गया, जो नियामक प्रक्रिया के विपरीत है। इतना ही नहीं, प्राथमिकी भी 23 अप्रैल को डीएम की अनुमति से पहले ही 19 अप्रैल को दर्ज कर दी गई, जिससे साफ झलकता है कि कार्यवाही में जल्दबाज़ी और पक्षपात की आशंका है।
हाईकोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति प्रकाश पाड़िया ने याचिकाकर्ता की बातों को गंभीरता से लेते हुए राज्य प्राधिकरण को छह सप्ताह के भीतर काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही, उन्होंने उपजिलाधिकारी मोदीनगर के 26 अप्रैल के निलंबन आदेश पर तब तक के लिए रोक लगा दी है, जब तक उच्च न्यायालय स्वयं कोई अंतिम निर्णय न दे।
समाज और अधिवक्ता समुदाय की प्रतिक्रिया
माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद के इस निर्णय पर वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. त्रिपाठी, राजीव कुमार पांडेय, अनिल शास्त्री, कृष्ण कुमार, सागर वर्मा, श्रवण यादव, उदय सिंह, तस्लीम जी, और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के युवा अधिवक्ता वैभव मिश्र, सलिल दुबे, ऋषभ मिश्र, वेदांशी त्रिपाठी आदि ने इस निर्णय को “न्याय की रोशनी” और “सामाजिक न्याय का जीवंत उदाहरण” करार दिया है। 70 वर्षीय लोकेश देवी के लिए यह फैसला सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं, बल्कि उस संवेदनशील न्याय व्यवस्था का प्रमाण है जो अंतिम व्यक्ति की आवाज भी सुनती है।


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