कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी नहीं कर पाईं पूर्व मंत्री मीनाक्षी लेखी, गंभीर चोट के बाद वापसी

कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी नहीं कर पाईं पूर्व मंत्री मीनाक्षी लेखी, गंभीर चोट के बाद वापसी

Uttarakhand News : कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान पूर्व केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री और बीजेपी नेता मीनाक्षी लेखी गंभीर रूप से घायल हो गईं। यह हादसा तिब्बत के दारचिन क्षेत्र में हुआ, जब वह यात्रा के दौरान एक घोड़े से गिर गईं। प्रारंभिक जांच में उनकी कमर में गंभीर चोट की पुष्टि हुई है, जिसके कारण उन्हें यह पवित्र यात्रा बीच में ही छोड़कर भारत लौटना पड़ा। मीनाक्षी लेखी को तिब्बत से लिपुलेख दर्रे के रास्ते भारत लाया गया और वर्तमान में वह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में गुंजी स्थित आईटीबीपी कैंप में चिकित्सा निगरानी में हैं।

यात्रा और हादसे का विवरण

कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदुओं, जैनियों, और बौद्धों के लिए एक अत्यंत पवित्र तीर्थयात्रा है, जो तिब्बत के कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के दर्शन और परिक्रमा के लिए आयोजित की जाती है। मीनाक्षी लेखी इस यात्रा के दूसरे दल में शामिल थीं, जिसमें कुल 48 यात्री थे, जिनमें 34 पुरुष और 14 महिलाएं थीं। यह दल 8 जुलाई को दिल्ली से रवाना हुआ और 14 जुलाई को लिपुलेख दर्रे के रास्ते तिब्बत पहुंचा। हादसा तब हुआ जब मीनाक्षी लेखी तिब्बत के दारचिन क्षेत्र में, जो कैलाश पर्वत की परिक्रमा का शुरुआती बिंदु है, घोड़े पर सवार थीं। अचानक वह घोड़े से गिर गईं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी कमर में गंभीर चोट आई। चीनी अधिकारियों ने तुरंत उनकी सहायता की और उन्हें लिपुलेख दर्रे पर भारतीय क्षेत्र में सौंप दिया।

हेलीकॉप्टर से अस्पताल भेजने की योजना

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों ने उन्हें गुंजी कैंप तक पहुंचाया, जहां उनकी स्थिति की निगरानी की जा रही है। आईटीबीपी के डॉक्टरों के अनुसार, मीनाक्षी लेखी की स्थिति स्थिर है और वह हवाई यात्रा के लिए उपयुक्त हैं। खराब मौसम के कारण उन्हें तुरंत हेलीकॉप्टर से दिल्ली ले जाना संभव नहीं हो सका, लेकिन 21 जुलाई को सुबह मौसम अनुकूल होने पर उन्हें हेलीकॉप्टर के जरिए अस्पताल ले जाया जाएगा। धारचूला के उप-जिलाधिकारी जीतेंद्र सिंह ने बताया कि मीनाक्षी लेखी गुंजी कैंप में रात बिताएंगी और उनकी चिकित्सा देखभाल आईटीबीपी के डॉक्टरों द्वारा की जा रही है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का महत्व

कैलाश मानसरोवर यात्रा को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। हिंदुओं का मानना है कि कैलाश पर्वत (6,638 मीटर ऊंचा) भगवान शिव का निवास स्थान है, जबकि जैन इसे अष्टपद पर्वत के रूप में पूजते हैं, जहां उनके पहले तीर्थंकर ऋषभदेव ने मोक्ष प्राप्त किया था। बौद्ध और बोन धर्म के अनुयायी भी इसे पवित्र मानते हैं। मानसरोवर झील, जो कैलाश पर्वत के पास स्थित है, अपने आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यह यात्रा भारत के दो मार्गों—उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथुला दर्रे—के माध्यम से आयोजित की जाती है। इस वर्ष, भारत सरकार ने 750 यात्रियों को इस तीर्थयात्रा के लिए चुना, जिनमें से 250 यात्री लिपुलेख दर्रे और 500 यात्री नाथुला दर्रे के रास्ते तिब्बत गए। यात्रा का आयोजन विदेश मंत्रालय और कुमाऊं मंडल विकास निगम के सहयोग से किया जाता है।

यात्रा में उत्साह और निराशा

मीनाक्षी लेखी का दल लिपुलेख दर्रे के रास्ते तिब्बत गया था। मीनाक्षी लेखी ने यात्रा शुरू करने से पहले पिथौरागढ़ में कहा था कि इस पवित्र यात्रा में शामिल होना उनके लिए सौभाग्य की बात है। हालांकि, हादसे के कारण उन्हें यात्रा अधूरी छोड़नी पड़ी, जिससे वह काफी निराश हैं। यह यात्रा शारीरिक और मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि इसमें उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लंबी पैदल यात्रा और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यात्रियों को धारचूला से शुरू होने वाले 10 दिनों के क्रमिक चढ़ाई के बाद 3,000 फीट से 14,000 फीट की ऊंचाई तक पहुंचना होता है, ताकि वे उच्च ऊंचाई के अनुकूल हो सकें।

दिल्ली ले जाया जाएगा

पिथौरागढ़ जिला प्रशासन और आईटीबीपी ने इस हादसे के बाद त्वरित कार्रवाई की। पिथौरागढ़ के जिला सूचना अधिकारी संतोष चंद ने बताया कि चीनी अधिकारियों द्वारा लिपुलेख दर्रे पर मीनाक्षी लेखी को सौंपने के बाद, आईटीबीपी ने उन्हें सुरक्षित रूप से गुंजी कैंप पहुंचाया। जिला प्रशासन मौसम की स्थिति पर नजर रख रहा है, ताकि उन्हें जल्द से जल्द दिल्ली के अस्पताल में भर्ती कराया जा सके।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का इतिहास

कैलाश मानसरोवर यात्रा का इतिहास सदियों पुराना है, लेकिन यह 20वीं सदी की शुरुआत में सामान्य तीर्थयात्रियों के लिए लोकप्रिय हुई। 1904 में ब्रिटिश शासन के दौरान तिब्बत को भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए खोला गया, जिसके बाद यात्रा की संख्या में वृद्धि हुई। 1950 में चीन द्वारा तिब्बत के अधिग्रहण के बाद यह यात्रा कुछ समय के लिए बंद रही, लेकिन 1981 में जनता पार्टी के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के प्रयासों से इसे फिर से शुरू किया गया। 2020 में कोविड-19 महामारी और भारत-चीन सीमा विवाद के कारण यह यात्रा स्थगित हो गई थी, लेकिन 2025 में इसे फिर से शुरू किया गया।

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Manisha Mediaperson

मनीषा हिंदी पत्रकारिेता में 20 वर्षों का गहन अनुभव रखती हैं। हिंदी पत्रकारिेता के विभिन्न संस्थानों के लिए काम करने का अनुभव। खेल, इंटरटेनमेंट और सेलीब्रिटी न्यूज पर गहरी पकड़। Uncut Times के साथ सफर आगे बढ़ा रही हैं। इनसे manisha.media@uncuttimes.com पर संपर्क कर सकते हैं।


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